चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद: जानिए 2023 के कानून और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का पूरा मामला
मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा चुनाव आयुक्तों (EC) के चयन से संबंधित वर्ष 2023 का अधिनियम एक बार फिर विधि और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। इस कानून की प्रमुख वजह विवाद में रहने की यह है कि इसने आयोग के सदस्यों के चयन हेतु बनी समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है।
इस विधायी प्रावधान की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ का भिन्न-भिन्न मत (Split Verdict) सामने आया है। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि क्या इस याचिका को किसी वृहद संविधान पीठ (Bench) के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। हालांकि, दोनों न्यायशास्त्रियों ने अंततः इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजने का निर्णय लिया है, ताकि वे उचित संख्या वाली पीठ का निर्धारण कर सकें।

पहले समझिए, 2023 में क्या बदला?
संसद ने दिसंबर 2023 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को पारित किया था। इस नए विधान के तहत गठित तीन सदस्यीय चयन पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को स्थान दिया गया।
इस प्रकार इस त्रिस्तरीय समिति में सरकार का पक्ष बहुमत (दो सदस्यों) में आ जाता है। इससे पूर्व लागू व्यवस्था के तहत चयन मंडल में CJI को एक तटस्थ सदस्य के तौर पर शामिल किया गया था, लेकिन नए कानून ने CJI के स्थान पर कैबिनेट मंत्री को सम्मिलित कर दिया।

CJI को हटाने पर सवाल क्यों उठा?
इस विवाद का आधार मार्च 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय से जुड़ा हुआ है। उस समय 5 जजों की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि जब तक विधायिका (संसद) इस विषय पर कोई स्पष्ट कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की त्रिस्तरीय समिति द्वारा ही किया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के सीधे प्रभाव से दूर रखना अनिवार्य है। हालांकि, इसके बाद संसद ने नया कानून बनाकर चयन समिति में CJI के स्थान पर कैबिनेट मंत्री को स्थान दे दिया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने संस्थागत स्वायत्तता के खिलाफ बताते हुए अदालत में चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
पाँच दिनों तक चली विस्तृत सुनवाई के उपरांत दो जजों की पीठ ने अलग-अलग राय प्रस्तुत की:
- जस्टिस दीपांकर दत्ता का दृष्टिकोण: उनका मानना था कि मामले को संविधान पीठ को संदर्भित करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों को स्थापित कर चुका है और वर्तमान पीठ यह तय करने में सक्षम है कि 2023 का कानून उन पैमानों पर खरा उतरता है या नहीं।
- जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का दृष्टिकोण: उनकी राय इसके विपरीत थी। उन्होंने कहा कि 2023 के इस विशिष्ट अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर अब तक अदालत का कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। CJI को हटाकर केंद्रीय मंत्री को शामिल करना संविधान के मूल ढांचे के अनुकूल है या नहीं, इस पर निर्णय संविधान पीठ को ही लेना चाहिए।

जस्टिस दत्ता ने चयन समिति पर क्या सवाल उठाए?
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने 2023 के कानून के अधीन निर्मित चयन मंडल के ढांचे पर गंभीर प्रश्न खड़े किए (हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि ये उनकी प्राथमिक टिप्पणियाँ हैं, कोई अंतिम निर्णय नहीं)।
उन्होंने उल्लेख किया कि समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा मनोनीत मंत्री की उपस्थिति से कार्यपालिका का सीधा बहुमत हो जाता है। ऐसी स्थिति में, मंत्री से यह अपेक्षा करना अव्यवहारिक है कि वह स्वयं को मनोनीत करने वाले शीर्ष नेतृत्व के निर्णय के विरुद्ध विचार रखेगा। मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के कारण पैनल में निष्पक्ष संतुलन कायम रख पाना कठिन हो जाता है।
क्या इससे फैसला 2:1 हो सकता है?
जस्टिस दत्ता ने चिंता जताई कि चयन समिति की ऐसी बनावट के कारण कोई भी निर्णय 2:1 के बहुमत से एकतरफा झुकाव वाला हो सकता है। यदि विपक्ष के नेता किसी नाम पर असहमति भी जताते हैं, तो भी कार्यपालिका के दो सदस्य अपनी पसंद के उम्मीदवार को आसानी से नियुक्त कर सकते हैं, जिससे आयोग की स्वायत्तता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
