July 21, 2024

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Ranchi नाम का 180 साल पहले नहीं था अस्तित्व, अंग्रेज कहते थे- ‘पीठ पर छौआ, माथ पर खांची…जब देखो तो समझो रांची’

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1845 के पहले रांची का नहीं था अस्तित्व
100 साल पहले रिची पहाड़ी (अब रांची पहाड़ी मंदिर) की कुछ पुरानी तस्वीर भी मौजूद है। जिसमें ये साफ नजर आता है कि आज जिस शहर की आबादी 12 लाख से अधिक हो गई है, उस वक्त इस शहर के आसपास की आबादी कुछ हजार में थी। अभी राजधानी रांची के जिस मेन रोड में पैदल चलता कठिन है, उस वक्त इस सड़क पर दो-चार लोगों का दिखना भी मुश्किल था। 1845 में जब लोहरदगा से किशुनपुर को किया गया, उस वक्त तक रांची नाम की कोई जगह नहीं थी। तब यहां केवल दो-चार गांव थे। जिसमें चुटिया, सिरोमटोली, चडरी, पिठौरिया और पत्थलकुदवा शामिल था। बाद में अपर बाजार और डोरंडा समेत अन्य इलाकों लोग बसे। आधिकारिक रूप से 1899 में जिला बना और इसे रांची कहा गया।

पुरानी रांची को आधुनिक बनाने में बंगाली समाज का बड़ा योगदान
रांची शहर के पुराने निवासी रवि दत्त बताते है कि 1947 में देश की आजादी तक शहर का स्वरूप ज्यादा बड़ा नहीं था। पुरानी रांची और रांची झील से पश्चिम में थोड़ी बहुत आबादी थी। जबकि चुटिया और बहू बाजार बाजार का मुख्य केंद्र था। वहीं ब्रिटिशकाल में बड़ी संख्या में बंगाली समुदाय के लोग थड़पखना, वर्द्धमान कम्पाउंड और कांके रोड में बस गए। गुदरी आजाद बस्ती में मोची और सफाई कर्मी रहते थे। पुरानी रांची को आधुनिक रांची बनाने में बंगाली समाज का बहुत योगदान रहा। विशेषकर डॉक्टर और शिक्षाविदों की बड़ी भूमिका रही। इसके अलावा आजादी के पहले से ही रांची में बड़ी संख्या में गुजराती और कच्छी समाज के संपन्न व्यवसायी रांची में रहते थे। लेकिन अपनी दूरदर्शिता की वजह से वे दुर्ग-भिलाई में कल-कारखाने खुलने पर वहां जाकर बस गए।

उद्योग धंधे का अभाव और सरकारी नौकरियांं की संख्या सीमित
आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले रांची में उद्योग धंधे नहीं थे। सरकारी नौकरियों की संख्या भी सीमित थी। उस वक्त प्राईवेट क्षेत्र में भी नौकरियां नहीं के बराबर थी। पूरी अर्थव्यवस्था कृषि और व्यवसाय पर निर्भर थी। शहर में अलग-अलग पेशा के कई स्थायी केंद्र थे। किराना, कपड़ा, ज्वेवरी, लोहा और हार्डवेयर के लिए अपर बाजार केंद्र था। लोहरा कोचा और चडरी में लोहरा समाज बहुतायत में थे। उस समय रंग रोगन के लिए चूना ही चलता था। जबकि भवन निर्माण के लिए भी चूना का उपयोग सीमेंट की जगह होता था। इसका भट्ठा कोकर और पहाड़ी मंदिर के पीछे इरगु टोली में था। चर्च रोड, दुर्गा मंदिर के पीछे चूना और नील का सबसे बड़ा बाजार होता था। अभी कुछ लोग डिस्टेंपर और ब्रांडेंड रंग के दौर में भी किसी प्रकार इसी से अपनी जीविका चला रहे हैं।

अपर बाजार, पुराना जेल के पहले ढिबरी पट्टी में ढिबरी, लालटेन, टिन के बक्सों का निर्माण और बिक्री होता था। कांसा, पीतल के बर्तनों की बिक्री और पॉलिस के लिए चर्च रोड, काली मंदिर रोड प्रसिद्ध था।

सदर अस्पताल और सीआईपी चिकित्सका का प्रमुख केंद्र
सदर अस्पताल प्रमुख चिकित्सा सेवा और बेहतर सुविधा का केंद्र था। सुदूर गांवों से लेकर झालदा और पुरुलिया तक के मरीज यहां आते थे। मानसिक रोगियों के लिए तो कांके स्थित केंद्रीय मनः चिकित्सा संस्थान को पूरे देश में अब भी प्रसिद्ध है। अपर बाजार क्षेत्र में नस बैठाने वाले और छोटी-मोटी चिकित्सा के लिए चांदसी डॉक्टर भी मिल जाते थे। पिठौरिया भी स्वर्णकारों और कुर्मी-महतो समाज का बड़ा गढ़ था।

एकीकृत बिहार में से ही शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा
1790 के बाद से झारखंड के कई आदिवासी बहुल इलाकों में ईसाई मिशनरियों का आगमन हो चुका था। ईसाई मिशनरियों की ओर से धर्म प्रचार के साथ ही स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में कई काम शुरू किए गए। रांची में ईसाई मिशनरियों की ओर से कई स्कूल-कॉलेज स्थापित किए गए। जिसके कारण रांची धीरे-धीरे शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनता गया। यही कारण है कि 100 साल पहले जब आदिवासी समाज में पढ़ाई-लिखाई का कोई खास महत्व नहीं था। लेकिन सुदूरवर्ती गांव में स्कूल की सुविधा उपलब्ध होने के कारण उनकी सोच में बदलाव आया। अब उनकी तीन-चार पीढ़ियां पढ़-लिख चुकी है। वे भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे है।

साल 2000 के बाद रांची के स्वरूप में तेजी से आया बदलाव
15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य गठन के बाद रांची के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया। पिछले 23 सालों के दौरान रांची शहर का तेजी से विस्तार हो रहा है। अब पड़ोसी जिले खूंटी, रामगढ़ और रामगढ़ शहर तक आबादी का विस्तार होता जा रहा है। शहर की आबादी में कई गुणा बढ़ोतरी होने से यातायात व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ा है। शहर के अधिकांश प्रमुख सड़कों पर लोगों को जाम से जूझना पड़ रहा है। हालांकि अभी रांची में तीन फ्लाईओवर भी बन रहे है, जिससे स्थिति में बड़े परिवर्त्तन की उम्मीद है।

Ranchi did not exist before 1845
Some old photographs of Richi Pahari (now Ranchi Pahari Temple) from 100 years ago also exist. In which it is clearly visible that today the population of the city which has increased to more than 12 lakhs, at that time the population around this city was only a few thousand. Right now it was difficult to walk on the main road of the capital Ranchi, at that time it was difficult to even see two or four people on this road. In 1845, when Lohardaga was transferred to Kishunpur, till that time there was no place named Ranchi. Then there were only two-four villages here. Which included Chutiya, Siromatoli, Chadri, Pithoria and Pathalkudwa. Later people settled in other areas including Upper Bazar and Doranda. The district was officially formed in 1899 and was called Ranchi.

Big contribution of Bengali society in making old Ranchi modern
Ravi Dutt, an old resident of Ranchi city, says that till the independence of the country in 1947, the form of the city was not very big. Old Ranchi and Ranchi were sparsely populated west of the lake. While Chutiya and Bahu Bazar was the main center of the market. At the same time, during the British period, a large number of people from the Bengali community settled in Thadpakhana, Vardhman Compound and Kanke Road. Cobblers and sweepers used to live in Gudri Azad Basti. The Bengali society contributed a lot in making old Ranchi a modern Ranchi. Especially doctors and educationists played a big role. Apart from this, a large number of affluent businessmen of Gujarati and Kutchi community lived in Ranchi before independence. But due to his foresight, he went and settled in Durg-Bhilai when the factory opened tomorrow.

Lack of industry and limited number of government jobs
About 150 years ago, there were no industries in Ranchi. The number of government jobs was also limited. At that time jobs in the private sector were also negligible. The entire economy depended on agriculture and business. The city had several permanent centers of different professions. The Upper Bazaar was the center for grocery, cloth, jewellery, iron and hardware. Lohra communities were in abundance in Lohra Kocha and Chadri. At that time only lime was used for coloring. While lime was also used in place of cement for building construction. Its kiln was in Irgu Toli behind Kokar and Pahari Temple. Church Road, Du

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