पटना के पांच बड़े अस्पतालों में 4484 मौतें हार्ट अटैक से, इनमें 673 नाबालिग-युवा शामिल
बदलती जीवनशैली, बिगड़ी खान-पान की आदतों और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण अब कम उम्र के लोग भी दिल की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। हृदय रोग को केवल बुजुर्गों से जोड़कर देखना अब गलत साबित हो रहा है। किशोरों और युवाओं में मोटापा, उच्च रक्तचाप (हाई बीपी), बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और शारीरिक निष्क्रियता जैसे जोखिम प्रमुखता से देखे जा रहे हैं।
इंडियन कार्डियोलॉजी ऑफ इंडिया (बिहार चैप्टर) द्वारा पटना के पांच प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों—आईजीआईसी (IGIC), आईजीआईएमएस (IGIMS), एनएमसीएच (NMCH), पीएमसीएच (PMCH) और पटना एम्स (AIIMS Patna)—में एक गहन सर्वे आयोजित किया गया। इस अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 8 महीनों (जनवरी से अब तक) में इन अस्पतालों में कुल 11,209 मरीजों की इलाज के दौरान मृत्यु हुई, जिनमें से लगभग 40% (4,484) मौतों की वजह केवल हार्ट अटैक रही। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मौतों में करीब 15% (लगभग 673) नाबालिग और युवा शामिल हैं।
16 से 18 साल के 247 किशोरों में हार्ट ब्लॉकेज मिला
अध्ययन में देखा गया कि पीएमसीएच परिसर स्थित इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC) में सबसे ज्यादा संख्या में नाबालिग मरीज इलाज के लिए पहुंचे। पिछले आठ महीनों में 15 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के 247 किशोरों की जांच में धमनियों में ब्लॉकेज पाया गया। यदि पांचों प्रमुख सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ शहर के निजी जांच केंद्रों को शामिल कर लिया जाए, तो दिल के ब्लॉकेज से पीड़ित कम उम्र के मरीजों की संख्या लगभग 672 तक पहुंच जाती है।
विशेषज्ञों और डॉक्टरों के अनुसार, इतनी कम आयु में कोरोनरी ब्लॉकेज का मिलना अत्यंत असामान्य है। इसके प्राथमिक कारणों में अत्याधिक वजन/मोटापा, असंतुलित बीपी और सुस्त जीवनशैली शामिल हैं। साथ ही, 19 से 25 साल के युवाओं में भी ब्लॉकेज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। चिकित्सकों का मानना है कि अनुवांशिक कारणों, पारिवारिक उच्च कोलेस्ट्रॉल इतिहास और अन्य जन्मजात स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं की समय पर गहन जांच होना आवश्यक है।
14 जिलों से पटना आ रहे हार्ट अटैक के मरीज
राजधानी में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और त्वरित इलाज की उपलब्धता के कारण न केवल पटना जिले के ग्रामीण इलाकों, बल्कि राज्य के 14 अन्य जिलों से भी मरीज आपात स्थिति में पटना का रुख करते हैं। वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, औरंगाबाद, जहानाबाद, अरवल, भोजपुर (आरा), सारण (छपरा), नवादा, मधेपुरा, गोपालगंज और नालंदा से गंभीर मरीजों को तुरंत पटना लाया जाता है।
यदि मरीज समय रहते (गोल्डन आवर में) अशोक राजपथ स्थित आईजीआईसी (IGIC) या बेली रोड स्थित आईजीआईएमएस (IGIMS) के कैथ लैब पहुंच जाते हैं, तो एंजियोप्लास्टी के जरिए उनकी जान बचाना संभव हो पाता है। बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और नालंदा जैसे इलाकों में यदि मरीज दो घंटे के भीतर पटना नहीं पहुंच सकते, तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह पर आवश्यक इंजेक्शन देकर उन्हें पटना स्थानांतरित किया जाता है। फिलहाल पटना में 8 प्रमुख निजी अस्पतालों और एम्स पटना में भी 24×7 कैथ लैब पूरी तरह से क्रियाशील हैं।
एक नजर, पटना के अस्पतालों में हुई इन मौतों की वजहों पर
सर्वे के दौरान पटना के इन प्रमुख अस्पतालों में दर्ज मौतों के प्राथमिक कारणों का प्रतिशत विभाजन इस प्रकार रहा:
- हार्ट अटैक: 40%
- सड़क एवं अन्य दुर्घटनाएं: 15%
- ब्रेन हेमरेज: 10%
- लिवर की विफलता (Lover Failure): 5%
- किडनी की विफलता (Kidney Failure): 5%
- छाती में गंभीर संक्रमण: 3%
- पीलिया (Jaundice): 2%
- टीबी (Tuberculosis): 2%
- अन्य अन्य बीमारियां: 19%


