भजपा नेता रमेश हांसदा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर झारखंड में सर्वे सेटलमेंट की मांग की

भाजपा नेता रमेश हांसदा ने प्रेस विज्ञाप्ति जारी कर जमीन से संबंधित समस्याओं को रखा। जिसमें मुख्य 5 समस्याएं इस प्रकार हैं :-
1.जिले में 30 प्रतिशत से अधिक खतियान ऑनलाइन नहीं होने से खरीद-बिक्री और टैक्स भरने में काफी परेशानी होती है।
2.1932-1964 के बाद सर्वे सेटलमेंट नहीं हुआ, क्योंकि यह मुद्दा नहीं बना।
3.ग्रामीणों के खेत सेटलमेंट में शामिल नहीं किए गए। यह जमीन विकास कार्यों में बाधा बनती है, जैसे तितिरबिला जाने वाली सड़क, राजनगर दुबराज जाने वाली सड़क, बुरुडीह का डिग्री कॉलेज, क्योंकि लगान काटे बिना जमीन का सरकारी मुआवजा नहीं दिया जाता, जिससे टकराव होता है।
4.1983 में मानगो, जुगसलाई, आदित्यपुर में सर्वे हुआ, लेकिन आदित्यपुर को नोट फाइनल होकर अमल में नहीं लाया गया।
5.पिछले 50-60 वर्षों से आदित्यपुर नगर निगम के अधीन 40 से अधिक बस्तियां सरकारी जमीन पर बसी हैं। इन्हें नियमित करने के लिए हम आंदोलन करेंगे।

उन्होंने बताया कि टाटा कंपनी ने 1907 से ही जमशेदपुर में लोहे का निर्माण शुरू किया था और इस लोहे के निर्माण में लगे हजारों मजदूर राजनगर, चाईबासा, मयूरभंज, रायरंगपुर, मिदनापुर, पुरुलिया, रांची, गुमला आदि आसपास के इलाकों से आदिवासी मूल निवासी लाए गए थे। ये लोग टाटा कंपनी में मजदूर के तौर पर काम करते थे। रहने की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण ये लोग धीरे-धीरे खड़कई नदी के इस पार आदित्यपुर इलाके में बसने लगे। क्योंकि पैसे के अभाव में ये लोग रैयत जमीन नहीं खरीद सकते थे। ये लोग कम दामों पर सरकारी जमीन पर बसने लगे और धीरे-धीरे इस इलाके में कई बस्तियां 50 से 70 साल पहले अस्तित्व में आ गई थीं।

इन बस्तियों में वर्तमान में करीब 43 बस्तियां हैं। वर्षों से बसे होने के कारण सरकारें इन लोगों को बिजली, पानी, सड़क, राशन आदि बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया करा रही हैं, लेकिन वर्षों से बसे ये लोग अवैध जमीन पर बसे होने के कारण सरकार द्वारा मिलने वाली कई अन्य सुविधाओं से आज भी वंचित हैं। लाभ से वंचित हैं। सरकारी नियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी जमीन पर 30 साल से अधिक समय तक बसता है तो उसे जमीन पर अधिकार मिल जाता है। वर्ष 1983 में मानगो, जुगसलाई और आदित्यपुर सरायकेला शहर में सर्वेक्षण कराया गया था।

सरकार ने मानगो और जुगसलाई का सर्वेक्षण तो लागू कर दिया, लेकिन आदित्यपुर और सरायकेला का सर्वेक्षण छोड़ दिया। 1990 के दशक में बिहार सरकार द्वारा बंदोबस्ती को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। झारखंड और बिहार में 1932 और 64 के बाद किसी भी सरकार द्वारा बंदोबस्ती या भूमि सुधार का काम नहीं किया गया, जिसके कारण आज भी गांव-टोलों में पुराने खतियान में वंशावली कायम कर विभिन्न प्रकार के भूमि कार्य किए जा रहे हैं। इसके कारण गलत तरीके से भूमि हस्तांतरण और लूट भी हो रही है।

राज्य में हो रहे तमाम भूमि घोटाले के कारण जमीनों का पूरा लेखा-जोखा नहीं होने के कारण आज बिचौलिए और जमीन दलाल फर्जी दस्तावेज बनाकर आसानी से ये सब काम कर रहे हैं। सर, झारखंड में भूमि सुधार की बहुत जरूरत है। या तो झारखंड में सर्वे सेटलमेंट करके लोगों को राहत दीजिए या फिर हमारे आदित्यपुर में, सरायकेला में 1983 में हुए सर्वे को मान्यता दीजिए ताकि वहां सालों से रह रहे लोगों को न्याय मिल सके।
