पश्चिम बंगाल सरकार ने 252 मदरसों को बंद करने के लिए भेजा नोटिस, क्या भारत में गैर कानूनी है मदरसा चलाना? जानें नियम
पश्चिम बंगाल प्रशासन की ओर से प्रदेश के 252 मदरसों को बंद किए जाने और लगभग 100 अन्य संस्थानों को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किए जाने के बाद मदरसों की कानूनी स्थिति पर बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इन शिक्षण संस्थानों को वैध प्राधिकार प्रमाणपत्र (वैलिड ऑथराइजेशन) प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा उन्हें बंद कर दिया जाएगा।
इस फैसले के बाद यह सवाल दोबारा चर्चा में आ गया है कि क्या भारत में मदरसा संचालित करना गैर-कानूनी है? क्या प्रत्येक मदरसे का पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराना अनिवार्य है? क्या बिना किसी सरकारी मान्यता के मदरसा चलाया जा सकता है? और क्या प्रशासन ऐसे मदरसों पर ताला लगा सकता है?
भारत में मदरसों के नियमन और संचालन से जुड़े प्रावधान पूरे देश में एक समान नहीं हैं। मदरसा शिक्षा मुख्य रूप से संबंधित राज्यों के कानूनों और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत आती है। उदाहरण स्वरूप, उत्तर प्रदेश में ‘मदरसा बोर्ड’ का गठन किया गया है, जबकि अन्य राज्यों में भिन्न-भिन्न नियमावली प्रभावी है।

पहले समझिए, रजिस्ट्रेशन और मान्यता में क्या अंतर है?
मदरसे के कानूनी अस्तित्व (पंजीकरण) और उसकी शैक्षणिक स्वीकृति (मान्यता) में मौलिक अंतर होता है:
- रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण): इसका आशय है कि मदरसे का संचालन करने वाली संस्था किसी वैध कानून (जैसे सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट या ट्रस्ट एक्ट) के तहत रजिस्टर्ड है। हालांकि, केवल पंजीकृत संस्था होने भर से उसे अपने आप शैक्षणिक मान्यता प्राप्त नहीं होती।
- मान्यता (अक्रेडिटेशन): इसका संबंध सीधा शिक्षण प्रणाली से है। इसमें राज्य सरकार या मदरसा बोर्ड यह जांच करता है कि संस्थान तय शैक्षणिक, प्रशासनिक और बुनियादी मानकों को पूरा करता है या नहीं।
इसलिए, किसी भी मदरसे की कानूनी अथवा गैर-कानूनी स्थिति का आकलन करने के लिए उसके पंजीकरण के साथ-साथ उसकी शैक्षणिक मान्यता की स्थिति देखना भी अनिवार्य है।

उत्तर प्रदेश में क्या है मदरसों के लिए नियम?
उत्तर प्रदेश में मदरसों का संचालन ‘उत्तर प्रदेश बोर्ड ऑफ मदरसा एजुकेशन एक्ट, 2004’ के जरिए होता है। मार्च 2024 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके बाद यह प्रकरण उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पहुंचा।
5 नवंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त करते हुए यूपी मदरसा एक्ट की संवैधानिक वैधता को कायम रखा। शीर्ष अदालत ने माना कि राज्य सरकार को मदरसों के पाठ्यक्रम, शिक्षण गुणवत्ता और परीक्षाओं के नियमन का पूरा अधिकार है। हालांकि, अदालत ने ‘कामिल’ और ‘फाजिल’ जैसी उच्च डिग्रियों को यूजीसी (UGC) अधिनियम के विपरीत मानते हुए उन पर रोक लगा दी।
क्या बिना मान्यता वाला मदरसा चल सकता है?
जनवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा था कि यदि संबंधित कानून में स्पष्ट आधार न हो, तो केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को सीधे बंद नहीं किया जा सकता।
हालाँकि, गैर-मान्यता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों के अधिकारों में बड़ा अंतर होता है। गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों को सरकारी अनुदान, मदरसा बोर्ड की अधिकृत परीक्षाओं में बैठने की अनुमति और सरकारी नौकरियों में डिग्रियों की मान्यता जैसी सुविधाएं नहीं प्राप्त होती हैं।

