बिजली और इंटरनेट नहीं, फिर भी असम के बेटे ने हासिल की नीट में सफलता
नीट यूजी (NEET UG) जैसी बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी परीक्षा में असम के एक छोटे से गांव के रहने वाले बिशु लिंबू ने 720 में से 610 अंक हासिल कर ऐतिहासिक सफलता पाई है। घर में न तो बिजली की सुविधा थी और न ही पढ़ाई के लिए इंटरनेट, लेकिन बिशु ने आर्थिक तंगी और अभावों के आगे हार नहीं मानी। बिना रुके अपनी तैयारी जारी रखी और आखिरकार डॉक्टर बनने का मार्ग प्रशस्त कर लिया। उनकी यह कामयाबी अब देशभर के ग्रामीण छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में शामिल नीट की तैयारी के लिए अक्सर छात्र महंगे कोचिंग संस्थानों और ऑनलाइन कोर्सेज पर भारी-भरकम राशि खर्च करते हैं। इसके बावजूद कई विद्यार्थियों को बार-बार प्रयास करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, बिशु लिंबू ने सीमित संसाधनों में ही केवल अपनी लगन और सेल्फ स्टडी के दम पर यह शानदार मुकाम हासिल किया है।
किसान परिवार से निकलकर मेडिकल कॉलेज तक का सफर
बिशु एक बेहद साधारण और गरीब कृषक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता पेशे से छोटे किसान हैं। परिवार की माली हालत इतनी खस्ता थी कि कई मौकों पर रोजमर्रा के घरेलू खर्च चलाना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता था। इन विकट परिस्थितियों में भी माता-पिता ने बिशु की पढ़ाई में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी और बेटे की काबिलियत पर हमेशा अटूट विश्वास जताया। माता-पिता का यही प्रोत्साहन बिशु की सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
लालटेन की रोशनी में की NEET की तैयारी
वर्तमान समय में ज्यादातर छात्र नीट की तैयारी के लिए इंटरनेट, डिजिटल मॉक टेस्ट, यूट्यूब वीडियो और ऐप आधारित स्टडी मैटेरियल पर निर्भर रहते हैं। हालांकि, बिशु के पास इनमें से कोई भी साधन उपलब्ध नहीं था। गांव में बिजली न होने के कारण वे हर रात लालटेन (डीबरी) की रोशनी में पढ़ाई करते थे। उन्होंने पूरी तरह अपनी टेक्स्ट बुक्स पर ध्यान केंद्रित किया, खुद के नोट्स बनाए और अनुशासित होकर रिविजन करते रहे।
610 अंक हासिल कर किया सपना पूरा
दिन-रात की कड़ी मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब बिशु ने NEET UG की परीक्षा में 610 अंक अर्जित किए। असम के इस होनहार छात्र ने यह साबित कर दिया है कि सफलता महंगे संसाधनों या कोचिंग की मोहताज नहीं होती, बल्कि अटूट दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से पाई जाती है। बिशु लिंबू की यह जीवन यात्रा उन सभी प्रतिभावान विद्यार्थियों का हौसला बढ़ाती है जो संसाधनों के अभाव में अपने सपनों को बीच में छोड़ देते हैं।
