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September 15, 2026

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बंगाल में सुप्रीम कोर्ट की ‘स्पेशन पावर’ से मिला वोटिंग राइट, ट्रिब्यूनल से एप्रुफ वोटर भी दे पायेंगे वोट

कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। राज्य में एसआईआर (SIR) सूची से हटाए गए लाखों नामों के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग किया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति न्यायाधिकरण (Tribunal) से अपनी नागरिकता या मतदाता पात्रता सिद्ध कर देता है, तो उसे वोट देने से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची ने साफ किया कि ट्रिब्यूनल से अनुमति प्राप्त करने वाले मतदाता इस बार के चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।

जारी होगी नई वोटर लिस्ट

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए निर्देश दिया है कि यदि चुनाव से मात्र दो दिन पहले भी किसी मतदाता के मामले का निपटारा न्यायाधिकरण द्वारा कर दिया जाता है, तो उसे मतदान की अनुमति देनी होगी।

चुनाव आयोग के सामान्य नियमों के तहत मतदाता सूची एक निश्चित समय के बाद ‘फ्रीज’ कर दी जाती है, जिसके बाद उसमें नए नाम जोड़ना कठिन होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद, बंगाल में पहले और दूसरे चरण के मतदान (क्रमशः 23 और 29 अप्रैल) से ठीक दो दिन पहले तक यदि किसी का नाम क्लियर होता है, तो प्रशासन को एक पूरक संशोधित मतदाता सूची (Supplementary Voters List) जारी करनी होगी। अनुच्छेद 142 कोर्ट को यह शक्ति देता है कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए वह ऐसे आदेश पारित कर सकता है जिन्हें देश के सभी संस्थानों को मानना अनिवार्य है।

तृणमूल और माकपा ने जताई खुशी

इस कानूनी लड़ाई में राज्य सरकार ने स्वयं हस्तक्षेप किया था और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से पक्ष रखने के लिए सक्रियता दिखाई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का राजनीतिक गलियारों में स्वागत किया जा रहा है।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद काकली घोष दस्तीदार ने इसे ‘लोकतंत्र की जीत’ करार दिया है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता और माकपा नेता विकास रंजन भट्टाचार्य ने इस जीत का श्रेय मुर्शिदाबाद की आम नागरिक मोस्तारी बानू को दिया, जिन्होंने अपने हक के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। कोर्ट के इस फैसले से उन लाखों लोगों को राहत मिली है जिनके नाम लंबित सूची या तकनीकी कारणों से काट दिए गए थे।

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