छऊ महोत्सव के आड़ में गलत चीजें बर्दाश्त नहीं होगी, चाहे जितना संघर्ष करना पडे पीछे नहीं हटेंगे… मनोज कुमार चौधरी
सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के संरक्षक सह पूर्व नगर पंचायत के उपाध्यक्ष मनोज चौधरी ने अपने पुराने अंदाज में दो टूक कहा कि हमारी प्राचीन परंपरा संस्कृति से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा, छऊ केवल नृत्य नहीं बल्कि यह हमारी परंपरा और संस्कृति और हमारी पहचान है छऊ महोत्सव की आड़ में कुछ प्रशासनिक पदाधिकारियों ने इसे एंजॉय का माध्यम बना दिया है जो की सरासर गलत है।आर्टिस्ट एसोसिएशन इसका पुरजोर विरोध करता हैं और भविष्य में करता रहेंगा।

यदि सचमुच प्रशासन हमारी वैश्विक नृत्य कला छऊ के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ईमानदारी से काम करना चाहता है तो सर्वप्रथम 1961 में बना राजकीय कला केंद्र को व्यवस्थित करें, जो हमारी वर्ष पुरानी मांग है कलाकारों के उत्थान से कला का उत्थान संभव है राजकीय छऊ कला केन्द्र,सरायकेला में शैक्षणिक माहौल तैयार कर नवांकुरों को छऊ की ककहरा सिखाने की व्यवस्था करें तदुपरांत परंपरा और संस्कृति से जुड़ा हुआ नाम को आत्मसात कर छऊ महोत्सव की जगह नई व्यवस्था को स्थापित करते हुए पुराने तरीके से “चैत्र पर्व” का आयोजन करें।

कार्यक्रम के दौरान कला एवं कलाकारों के सम्मान एवं स्वालंबन को ध्यान दें कलाकारों की जीविकापार्जन हेतु उचित पारितोषिक की व्यवस्था करें, चैत्र पर्व के दौरान ग्रामीण नृत्य दलों की प्रतियोगिता को पारदर्शिता के साथ करें एवं महोत्सव के नाम पर बड़े-बड़े कलाकारों को बुलाकर ग्लैमर के नाम पर छऊ कलाकारों के नाम पर आई हुई राशि को बंदरबांट करने में परहेज करें साथ ही साथ कलाकार दलों को मंच में नृत्य प्रस्तुति के एवज में मात्र 15000 की जगह प्रोत्साहन राशि 50000/- करने पर विचार करें तब जाकर कला समृद्धि एवं संरक्षित रहेगी।

इस कला को विश्व प्रसिद्ध मिली है अनेक कलाकार को पद्मश्री और कई पुरस्कार मिल चुके हैं अगर यूनेस्को द्वारा इस कला को अमर्त्य कला की श्रेणी में रखा गया है तो सरकार और प्रशासन की तत्परता भी नज़र आनी चाहिए जानकारों की एक समूह को हर विधा की डाक्यूमेंटेशन के लिए बीच-बीच में सेमिनारों का आयोजन किया जाना निहायत आवश्यक है ज़रूरत पड़े तो बाहर से भी विज्ञ लोगों को इसमें शामिल करना होगा।

विगत दो सालों से हमारी पहचान छऊ कला का मंदिर हिचकोले ले रहा है जो चिंता का विषय है मगर मेरा मानना है कि जल्दबाजी नहीं प्रायोरिटी आधार पर काम को आगे बढ़ाना चाहिए सभी को एकजूटता के साथ लेकर हमलोग हमारी इस वैश्विक कला को नया आयाम दे सकते हैं जो आनेवाली पीढ़ियों के लिए हमारी अनमोल भेंट होगी।इतना जानने के बाद भी हम लोगों ने कुछ नहीं किया तो हमें आने वाली पीढ़िया कभी माफ नहीं करेगी, कुछ भी नामुमकिन नहीं है।
