बदलता एशिया और भारत की नई कूटनीति -1: कहां चीन, कहां हम?
विश्व राजनीति का अगला सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक दौर अब एशियाई महाद्वीप में आकार ले रहा है।
चीन की विशाल आर्थिक व सैन्य शक्ति, इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) क्षेत्र में लगातार बढ़ता रणनीतिक तनाव, दक्षिण एशियाई पड़ोसियों में तेजी से बदलते सियासी हालात और आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने संपूर्ण क्षेत्र के भू-राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह री-शेप कर दिया है।
इस तेज़ी से बदलते माहौल में भारत के समक्ष चुनौती केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय अगुआ बनने, मजबूत आर्थिक साझेदारियां बनाने और वैश्विक मंच पर एक सशक्त महाशक्ति के रूप में अपनी धाक जमाने की भी है।
ऐसे में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (Neighbourhood First) और ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीतियों से लेकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक भारत का रणनीतिक खाका कितना असरदार साबित हो रहा है? चीन की आक्रामक और निरंतर बढ़ती मौजूदगी का भारत किस प्रकार मुकाबला कर सकता है? इसके अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा मालदीव जैसे पड़ोसी मुल्कों में हो रहे राजनीतिक उलटफेर भारत के दृष्टिकोण से क्या संकेत देते हैं?
इन सभी समसामयिक और कूटनीतिक पहलुओं पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापक एवं एशियाई मामलों की जानी-मानी विशेषज्ञ डॉ. अपर्णा चौधरी के साथ विशेष परिचर्चा:
आज के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में एशिया क्षेत्र में भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकताएं क्या हैं?
मौजूदा दौर में भारत के विदेशी मामलों की प्राथमिकताएं बड़ी तेज़ी से पुनर्गठित हो रही हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण एशियाई क्षेत्र में आ रहे व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हैं, जो सामूहिक रूप से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को नया मोड़ दे रहे हैं।
भारत के समीपवर्ती पड़ोसियों, जैसे बांग्लादेश और नेपाल में हुए बड़े जनांदोलनों व शासन परिवर्तन का असर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण-पश्चिम एशिया के देश भी एक बड़े संक्रमणकालीन चरण (Transition Phase) से गुज़र रहे हैं।
इन तमाम राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय व बहुपक्षीय आर्थिक और कूटनीतिक जुड़ाव तय करने में अब आधुनिक तकनीक एक केंद्रीय कारक बनकर उभरी है।
इसके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण रणनीतिक मोड़ आया है, जहां आर्थिक तालमेल को सीधे सुरक्षा और सामरिक सहयोग से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्तमान में एशिया के भीतर केवल पारंपरिक भू-राजनीति ही नहीं, बल्कि सॉफ्ट पावर (Soft Power) भी विदेश नीतियों के निर्माण में एक असरदार भूमिका निभा रही है।
चीन की बढ़ती आर्थिक, सैन्य और सामरिक सक्रियता के बीच भारत अपनी क्षेत्रीय भूमिका को किस प्रकार मजबूत कर सकता है?
बीजिंग के साथ भारत के आर्थिक, सैन्य और सामरिक रिश्ते हमेशा से ही वैश्विक विमर्श के केंद्र में रहे हैं। चीन जिस आक्रामकता के साथ अपनी सॉफ्ट पावर और ट्रैक-2 डिप्लोमेसी को अपनी आर्थिक व सैन्य ताकत से जोड़कर विस्तारवादी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है, वह न सिर्फ नई दिल्ली बल्कि कई अन्य एशियाई मुल्कों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
भारत को इस स्थिति से निपटने के लिए दोहरे स्तर पर रणनीति बनाकर काम करने की आवश्यकता है:
- अन्य एशियाई देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में अधिक गहराई और प्रगाढ़ता लाना।
- क्षेत्रीय मंचों और संगठनों के भीतर अपनी मौजूदगी और नेतृत्वकारी भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाना।


