दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी एवं दलमा से सटे निकटवर्ती ग्रामीणों के साथ वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु बैठक, देखें VIDEO
चांडिल अनुमंडल दलमा मकुलकोचा संग्रहालय में वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा दलमा वाणी प्राणी आश्रयणी इको विकास समितियों के साथ पशु शिकार के अवसर पर वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु बैठक रखी गई। जहाँ दलमा के दोनों रेंज पुवी – पश्चिम के रेंजर ने दिनेश चन्द्र, अर्पणा चंद्र ने कहा की वन्य जन्तुओं के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना से रहते आये हैं।

वन एवं वन्य जन्तु हमारी सांस्कृतिक धरोहर है तथा समाज एवं राष्ट्र की अमूल्य संपत्ति है। “अहिंसा परमोधर्मः” हमारी परम्परा है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भी हमें इसका पाठ पढ़ाया है जिसकी सार्थकता कड़ी से कड़ी चुनौतीपूर्ण घड़ी में भी खरी है। वन, वनवासियों एवं अन्य जन्तुओं में अन्योन्याश्रय संबंध है।वही ग्रामीणों ने भी अपनी बातों को रखा कहा विश्व शिकार दिवस बैठक में किस तरह हम जानवरों की सुरक्षा कर एवं वन को बचाने के लिए हम क्या कर सकते है सदियों से वे एक-दूसरे के पूरक रहे हैं एवं सह-अस्तित्व की भावना से रहते आये हैं।

परन्तु खासकर पिसली दो सदियों के दौरान मानव-जनित कारणों से वनों के विस्तार और उनके घनत्व में कमी आयी है जिसके कारण इनमें रहनेवाले अधिसंख्य वन्य जीव प्रजातियों की संख्या कम हो गयी है। फलस्वरूप इनमें से अनेक तो विलुप्ति के कगार पर पहुँच गये हैं। यह खतरे की घंटी है। प्रकृति का सौम्य एवं संतुलन बिगडना समस्त मानव जाति के लिए हानिकारक एवं विनाशकारी है।समय आ गया है कि हम इन खतरों के प्रति सजग होकर पुराने रीति-रिवाजों में परिवर्तन लायें ।

यदि हम अपनी सोच और आचरण नहीं बदलेगें तो हम अपने वन्य जीवों को सदा के लिए विलुप्त होने से नहीं बचा सकेंगे और यदि ऐसा होता है, तो हमारी भावी पीढ़ियों हमें कभी माफ नहीं करेगी। संभवतः यही मानव जाति का भी धरती पर से विलुप्त होने का कारण बन सकता है। याद रहे, इस ब्रह्माण्ड में केवल एक धरती है जो कि हमें पूर्वजों से विरासत के रूप में नहीं मिली है, बल्कि हमने अपनी भावी पीढ़ियों से उधार ली है जिसे सुरक्षित रूप में उन्हें सौंपना हमारा दायित्व है ।

पिछले वर्ष मनाये गये पशु शिकार के महान पर्व पर जीव जन्तुओं की हत्या नहीं कर दलमा के निकटवर्ती क्षेत्रों के आदिवासी भाईयों द्वारा जो इतिहास रचा गया है, उसकी ना केवल हमारे देश में अपितु विश्व भर में सराहना हुई है। अब समय आ गया है जबकि हमारे राज्य के आदिवासी भाईयों को वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु पूरे राष्ट्र का नेतृत्व करने की बागडोर संभालनी है।हम अपने कर्तव्य का निर्वाह पूरी निष्ठा से करते हुए यह संकल्प लें कि विशु शिकार को अब वन्य जन्तुओं को मार कर नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करके मनायेंगे ।
