बंगाल चुनाव और ‘खूनी’ विरासत : 20 साल से हर इलेक्शन में बहा लहू, डराने वाले हैं राजनीतिक हिंसा के ये आंकड़े
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मद्देनजर राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग ने कड़े इंतजाम किए हैं। लगभग 2 लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके पीछे की मुख्य वजह बंगाल की राजनीति का वह काला अध्याय है, जहां चुनावी प्रक्रिया अक्सर हिंसा की भेंट चढ़ जाती है। राज्य में लोकतंत्र का उत्सव कई बार खूनी संघर्ष में तब्दील होता रहा है, जिससे आम जनता में डर बना रहता है।
नंदीग्राम से संदेशखाली तक: हजारों परिवारों के अनकहे जख्म
बीते 20 सालों का रिकॉर्ड देखें तो बंगाल में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बारूद और खून के बीच लड़ी गई है। नंदीग्राम के ऐतिहासिक आंदोलन से लेकर हालिया संदेशखाली की घटनाओं तक, सत्ता हासिल करने की होड़ ने अनगिनत परिवारों को कभी न भरने वाले घाव दिए हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने यहाँ के लोकतंत्र को बार-बार चोट पहुंचाई है।

20 साल का हिंसक सफर: जब लोकतंत्र पर भारी पड़ी दहशत
बंगाल में चुनावी हिंसा किसी एक पार्टी या विशेष समय तक सीमित नहीं रही है। पिछले दो दशकों में हिंसा का स्वरूप और भी विकराल हुआ है। नामांकन से लेकर मतदान के दिन तक, बमों के धमाके और गोलियों की गूंज एक कड़वी सच्चाई बन गई है। 2006 से लेकर 2026 के मुहाने तक, सत्ता के चेहरे तो बदले लेकिन चुनावी रणभूमि का ‘लाल रंग’ नहीं बदला।
2006-2011: वामपंथी शासन का ढलान और बढ़ता संघर्ष
आज से दो दशक पहले जब बंगाल में वाममोर्चा की पकड़ कमजोर हो रही थी, तब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी।
- नंदीग्राम और सिंगूर (2007-2008): ये वो साल थे जिन्होंने बंगाल की राजनीति की दिशा मोड़ दी। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुए आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। नंदीग्राम में हुई पुलिस फायरिंग और राजनीतिक झड़पों को चुनावी इतिहास का सबसे काला पन्ना माना जाता है।
- क्षेत्रीय वर्चस्व: पश्चिमी मेदिनीपुर और बांकुड़ा जैसे जिलों में राजनीतिक रंजिश के चलते सैकड़ों कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी।
2011: ‘परिवर्तन’ के चुनाव और अधूरी उम्मीदें
साल 2011 में जब ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी शासन का अंत किया, तो लोगों को लगा कि अब हिंसा का अंत होगा। ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए’ का नारा दिया गया, लेकिन इसके बावजूद चुनावी रैलियों और सत्ता हस्तांतरण के दौरान हिंसक घटनाएं जारी रहीं। सत्ता बदली, लेकिन चुनावी प्रक्रिया में होने वाले टकराव का सिलसिला नहीं थमा।
2018-2019: हिंसा का आधुनिक और भयावह चेहरा
पिछले 20 वर्षों में 2018 के पंचायत चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव हिंसा के मामले में सबसे भयावह माने जाते हैं।
- पंचायत चुनाव की त्रासदी: बंगाल में अक्सर विधानसभा से ज्यादा हिंसक मंजर पंचायत चुनावों में देखने को मिलते हैं। 2018 और 2023 के पंचायत चुनावों के दौरान हुई मौतों ने लोकतांत्रिक साख पर सवाल खड़े किए। विपक्षी दलों को नामांकन से रोकने के लिए खुल्लम-खुल्ला बमबारी और गोलीबारी की गई।
- लोकसभा चुनाव 2019: भाजपा के उभरते प्रभाव और टीएमसी के बचाव के बीच संदेशखाली और भाटपाड़ा जैसे इलाके जंग के मैदान में तब्दील हो गए थे। नारों की होड़ और वैचारिक मतभेद अक्सर खूनी संघर्ष का रूप ले लेते हैं।
