FIFA World Cup 2026: जन्मभूमि छोड़ पूर्वजों की धरती के लिए मैदान पर उतरे 290 खिलाड़ी, फ्रांस और नीदरलैंड बने ‘टैलेंट हब’
FIFA World Cup 2026: फीफा विश्व कप 2026 में एक बेहद दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है। इस बार टूर्नामेंट में लगभग 290 फुटबॉलर ऐसे खेल रहे हैं, जिनका जन्म उस देश में नहीं हुआ है जिसकी जर्सी पहनकर वे मैदान पर देश का मान बढ़ा रहे हैं। इस मेगा इवेंट में शामिल होने वाले हर चार खिलाड़ियों में से करीब एक खिलाड़ी प्रवासी बैकग्राउंड से ताल्लुक रखता है। इस पूरे ट्रेंड में फ्रांस और नीदरलैंड्स दुनिया के सबसे बड़े ‘प्लेयर एक्सपोर्टर’ यानी फुटबॉलरों के निर्यातक देश बनकर सामने आए हैं।
फुटबॉल का यह महाकुंभ सिर्फ विभिन्न देशों की खेल प्रतिभाओं की टक्कर नहीं है, बल्कि यह इंसानी प्रवास, सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक जड़ों से जुड़ाव की एक अनोखी दास्तान भी पेश कर रहा है। टूर्नामेंट में भाग ले रहे कुल 1,248 खिलाड़ियों में से करीब 290 खिलाड़ी अपनी जन्मभूमि के बजाय दोहरी नागरिकता या अपने माता-पिता के मूल देश (पूर्वजों की धरती) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
फ्रांस और नीदरलैंड बने दुनिया की ‘फुटबॉल फैक्ट्री’
प्रवासी खिलाड़ियों को दुनिया के दूसरे देशों की टीमों तक पहुँचाने के इस मामले में फ्रांस और नीदरलैंड्स सबसे आगे हैं। इस वर्ल्ड कप में हिस्सा ले रहे खिलाड़ियों में से 75 ऐसे हैं जो फ्रांस में पैदा हुए और 42 खिलाड़ी ऐसे हैं जो नीदरलैंड्स में जन्मे, लेकिन वे अन्य देशों की राष्ट्रीय टीमों से खेल रहे हैं। इस सूची में आगे जर्मनी (23), इंग्लैंड (21), बेल्जियम (11), स्पेन (11) और स्वीडन (10) जैसे देश शामिल हैं। इन यूरोपीय देशों का मजबूत ग्रासरूट फुटबॉल इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन यूथ अकादमियां दुनिया के लिए वर्ल्ड-क्लास खिलाड़ी तैयार कर रही हैं। ऐसे में जो खिलाड़ी अपनी जन्मभूमि की नेशनल टीम में जगह नहीं बना पाते, वे अपनी पारिवारिक जड़ों वाले देशों की ओर से खेलने का फैसला कर लेते हैं।
क्यूरासाओ और डीआर कांगो में सबसे ज्यादा प्रवासी खिलाड़ी
इस वर्ल्ड कप के दौरान क्यूरासाओ और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआर कांगो) की टीमें प्रवासी प्रतिभाओं की सबसे बेहतरीन मिसाल पेश कर रही हैं। क्यूरासाओ की पूरी टीम ही ऐसे फुटबॉलरों से सजी है जिनका जन्म नीदरलैंड्स में हुआ था। दूसरी तरफ, डीआर कांगो की टीम के 20 खिलाड़ी फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में पैदा हुए हैं। इनके अलावा मोरक्को के 19, हैती के 16, अल्जीरिया के 15 और केप वर्दे के 13 खिलाड़ी भी प्रवासी पृष्ठभूमि से आते हैं। यही वजह है कि इन देशों ने ग्लोबल फुटबॉल में एक बड़ा उलटफेर करने की क्षमता हासिल कर ली है।
भारतीय मूल के 4 खिलाड़ी भी खेल रहे वर्ल्ड कप
भले ही टीम इंडिया फीफा विश्व कप 2026 के मुख्य दौर में जगह बनाने से चूक गई हो, लेकिन भारतीय फैंस के लिए गर्व की बात यह है कि भारतीय मूल के चार खिलाड़ी इस बार अलग-अलग देशों की ओर से विश्व कप में अपना जलवा बिखेर रहे हैं। इन खिलाड़ियों में न्यूजीलैंड टीम के सरप्रीत सिंह, ऑस्ट्रेलिया की तरफ से खेलने वाले निशान वेलुपिल्लै, डीआर कांगो के सैमुअल मूटूसामी और कतर की टीम का प्रतिनिधित्व करने वाले तहसीन मोहम्मद जमशीद शामिल हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही है यह प्रवृत्ति?
यह पूरा बदलाव फीफा (FIFA) के लचीले नियमों की वजह से संभव हो सका है। फीफा के नियम कहते हैं कि अगर किसी खिलाड़ी के माता-पिता या दादा-दादी का संबंध किसी अन्य देश से रहा है, तो वह खिलाड़ी उस देश की नेशनल टीम चुन सकता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो फ्रांस और नीदरलैंड्स का अतीत में अफ्रीका, कैरेबियन और एशिया के कई हिस्सों पर शासन रहा है। इसी के चलते 20वीं सदी में लाखों लोग बेहतर रोजगार और जिंदगी की चाह में इन यूरोपीय देशों में आकर बस गए थे। उनकी अगली पीढ़ी वहीं पैदा हुई, वहीं के क्लबों में फुटबॉल का ककहरा सीखा और बड़ी हुई। आगे चलकर इनमें से कई स्टार खिलाड़ियों ने अपने जन्म के देश के बजाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पूर्वजों के देश की जर्सी पहनना ज्यादा बेहतर समझा।
