जिस राजा की प्रजा दु:खी तो समझो वह राजा भी दु:खी रहेगा – आचार्य वेदानंद शास्त्री
सरायकेला : मारवाड़ी युवा मंच अखिल भारत मारवाड़ी महिला समिति अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त तत्वाधान में मारवाड़ी धर्मशाला में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा का सातवें दिन आचार्य वेदानंद शास्त्री ने बताया जब जटायु नासिक के पंचवटी में रहते थे तब एक दिन आखेट के समय महाराज दशरथ से उनकी मुलाकात हुई और तभी से वे और दशरथ मित्र बन गए।

वनवास के समय जब भगवान श्रीराम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब पहली बार जटायु से उनका परिचय हुआ। भगवान श्रीराम अपने पिता के मित्र जटायु का सम्मान अपने पिता के समान ही करते थे। रावण जब सीताजी का हरण कर लेकर गया तब सीताजी का विलाप सुनकर जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया, लेकिन अंत में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और रावण सीताजी को लेकर लंका की ओर चला गया। सीता की खोज करते हुए राम जब रास्ते से गुजर रहे थे तो उन्हें घायल अवस्था में जटायु मिले। जटायु मरणासन्न थे। जटायु ने राम को पूरी कहानी सुनाई और यह भी बताया रावण किस दिशा में गया है। जटायु के मरने के बाद राम ने उसका वहीं अंतिम संस्कार और पिंडदान किया। कितनी बड़ी बात है एक गिद्ध जो मांसाहारी है वो भारत का वीर है जो रावण जैसी ताकत के सामने छाती ठोक कर खड़ा हो गया। ऐसे वीरों का देश है ये भारत देश।

इसके बाद भगवान राम ने मां सबरी के झूठे बेर का भोग लगाया। पं. शास्त्री ने कहा राजा की प्रजा दुखी है तो वो राजा भी दुखी है। राजा सोया रहेगा तो प्रजा जागेगी नहीं। इसलिए केवल राम पर विश्वास करे। उन्होंने राम और भरत मिलन की कथा सुनायी कथा में भरत ननिहाल से आकर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर अयोध्या से गुरु वशिष्ठ को साथ लेकर तीनों माताओं के साथ वन के लिए प्रस्थान किया। आगे निसाद राज से भेंट हुई तब ज्ञात हुआ कि भारद्वाज ऋषि के आश्रम में राम पधारे थे। ऐसा जानकर भरत ने मुनि को प्रणाम कर प्रभु श्रीराम का कुशल छेम पूछा। तब पता चला कि प्रभु चित्रकुट में कुटी बनाकर निवास कर रहे हैं। तब भरत की यात्रा चित्रकुट के लिए प्रस्थान हुई। देवताओं ने भरत की सेवा कर भक्तों का मान बढ़ाया। आगे जब श्रीराम ने भरत को देखा तो मन ही मन प्रसन्न हुए। राम और भरत का मिलन देखकर देवताएं भी पुष्प वृष्टि करने लगे। सीता ने अपनी सासू माताओं को प्रणाक कर पिता जनक से मिली। उसके बाद वशिष्ठ के चरणों की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त की।

उधर भरत अयोध्या जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं। राम ने बताया भरत पिता के वैकुंठ जाने पर प्रजा की रक्षार्थ आप हमारी चरण पादुकाओं को अयोध्या की राजगद्दी पर स्थापित करें। ऐसा वचन सुन भरत को संतोष हुआ। आगे पादुका सिर पर धारण कर अयोध्या पुनः वापस आ गए और नंदी गांव में कुश का आसन बिछाकर 14 वर्ष अयोध्या के प्रजा की सेवा कर अपनी रामभक्ति का अनूठा प्रदर्शन किया। इसलिए संतों ने कहा है कि बड़ा भाई हो तो श्रीराम जैसे और छोटा भाई हो तो भरत जैसे।सातवें दिन दिन कथा के मुख्य यजमान सीताराम सेक्सरिया नगर पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी, युवा मंच के अध्यक्ष आकाश अग्रवाल महिला समिति की अध्यक्षा रेखा सेक्सरिया रविंद्र अग्रवाल बबीता अग्रवाल सविता चौधरी इंद्रा अग्रवाल सरोज सेक्सरिया केदारनाथ अग्रवाल गौर गोविंद शाह सुषमा चौधरी कविता अग्रवाल एवं काफी संख्या में श्रोतागण उपस्थित थे।
